Friday, May 17, 2013

क्या खोया, क्या पाया ?


क्यूँ सब होते हुए भी सुकून नहीं है ?
क्यूँ बे वजह दिल में दर्द कहीं है ?
क्यूँ खोया खोया सा यह एहसास है ?
क्यूँ ख्यालों में न कोई आस है ?
जैसा चाहा था वैसा आज सभी है ?
अच्छी नौकरी, अच्छा घर ,
फिर क्या कमी है ?
क्यूँ सब होते हुए भी सुकून नहीं है ?

क्यूँ खालीपन मन में समाये जा रहा है ?
क्यूँ अन्दर ही अन्दर अँधेरा छाता जा रहा है ?
क्यूँ आशाएँ-इक्चाएं आज ख़तम हो रही है ?
क्यूँ .... ?

कुछ बातें मन को विचलित कर रही है |
शायद मेरी इस्तिथि पर सवाल कर रहीं है |
एक आवाज़ जैसे अन्दर चीख भर रही है |
मेरे आगे के सफ़र का रास्ता पूछ रही है |
 और मेरी इस विडंबना पर हस रही है |

 वोह मुझसे पूछ रही है ,
 क्या यही तुम बनना चाहते थे ?
क्या यही जीवन का उद्देश्य था ?
क्या इसी के लिए तुम लड़ते थे ?
क्या यही तुम्हारा संघर्ष था ?
बातें तो बड़ी-बड़ी कहा करते थे |
पंछियों सी उड़ान भरा करते थे |
लक्ष्य अनंत रखा करते थे |
और दुनिया बदलने की सोचा करते थे |

आज तुम इसका हिस्सा बनते जा रहे हो |
भीड़ में पहचान खोये जा रहे हो |



Friday, April 5, 2013

होली !

होली का सवेरा एक सुखद एहसास है |
इसमें आशा, ख़ुशी और चंचलता का न्यास है |
हवा का मिजाज़ कुछ बदल सा जाता है |
कब मुट्ठी भर गुलाल कोई उसमें उड़ा जाता है |

इस रंगों के त्यौहार का अपना ही रंग है |
मन में जागी कई सोयी उमंग है |
बचपन की शरारतें तब याद आती है |
उम्र भुलाने को मजबूर जार जाती है |
रंग हाथ में लिए तब हम निकलते हैं |
और सभी साथियों के साथ हुडदंग करते हैं |
एक दुसरे के रंगे चहरे देख,
आनंद का अनुभव  कुछ खास  होता है |
हसी के ठहाकों से ज़िन्दगी का एहसास होता है |

रंगों का महत्व इस पर्व से समझ आता है |
यह एक दिन हम सबको जिंदादिली दे जाता है |
त्वचा पे लगा रंग तो अगले दिन साथ छोड़ जाता है |
पर मन पे लगा ख़ुशी, आशा, उमंग और सुकून से भरा रंग,
अगली होली तक साथ निभाता है |


Friday, September 23, 2011

कारवां !!



जब कभी मैं पलट के देखता हूँ,
उन हसीन लम्हों को सोचता हूँ |
यादें मुझे स्तब्ध कर जाती हैं,
पलकों पे वो मेरी आसू छोड़ जाती हैं |
हाल-ऐ-दिल तब अजीब होता है,
मेरा रकीब जब करीब होता है |
वक़्त वहीं ठहर जाता है,
आँखों मैं जब उसका चेहरा मुस्कुराता है |
उसके होटों कि हसी न जाने क्या कर जाती है,
तनहाइयों में मेरे ख्वाब भर जाती है |
बातें तब उसकी याद आती हैं,
संघर्ष करने कि हिम्मत दे जाती हैं |
थोडा मुस्कुरा तब मैं कलम उठता हूँ,
कागज़ पर अपना दिल सवारता हूँ |
एक उत्पीड़न तब उठती है,
गुज़ारे वक़्त कि जब झांकी निकलती है |
अचानक ही मन शांत हो जाता है,
सवालों का गुलदस्ता सिरहाने छोड़ जाता है | 
शायद इस पल भर के सुकून को ही जीवन कहते हैं,
कारवां तो बस चलते ही जाता है |

Tuesday, January 4, 2011

Civil :)




बात है मई (2005) कि तूफानी रात की,
सपने में आए कुछ अजीब हालत कि |
मैंने MANIT के LECTURE HALL में खुद को पाया,
CIVIL कि CLASS थी LECTURE खत्म होने के बाद समझ आया |
CIVIL की कुड़ी ने धड़काया मेरा दिल,
तब से जमने लगी CLASS में मेहफिल |

उसके दिवाने हम होते चले गए,
उसके खयालों में खोते चले गए |
उसे IMPRESS करने के लिए 12000 का CELL ले डाला,
उसने लगा दिया था मेरी अकल पर ताला |
पर अब धीरे -धीरे होश आ रहा है,
CLASS-COLLEGE की बाकी लड़कियों पर भी ध्यान जा रहा है |
CLASS में हमेशा 1st आता हूँ,
क्युंकी COMPETITION ही एक से लगता हूँ | 

CLASS की एक लड़की थी बहुत जि़द्दी,
SEM. TOP करने की थी उसके पास सिद्धि |
मेरी उस्से कभी बात ना होती थी,
पर मेरी क्या TEACHER की उसके सामने हालत खराब होती थी |
Doubt पूछ-पूछ कर हर TEACHER को तड़पती,
और G.T. नहीं लगाउंगी इस बात पर अड़ जाती थी |
मैं उसे 1st YEAR में कभी समझ ना पाया,
फिर मेरे एक दोस्त ने मुझे उसके बारे में बताया |
दिल की थी वोह भी एकदम साफ़,
पर गुस्सा है उसका बड़ा खराब |

CIVIL में थे तो सोचा बनायेंगे मकान,
पर नहीं थम रहा था दिल का तूफ़ान |
लेकिन उस रात का तूफ़ान अचानक थम गया,
और में एकाएक नींद से जग गया |
इस सपने ने मुझे पूरा हिला डाला ,
एक रात में मुझे FUTURE दिखा डाला |
आज ये जीवन की सच्चाई है,
हमने MANIT में CIVIL पाई है 
मकान बनाने का तोह पता नहीं,
उस कुड़ी का मकान गिराने की कसम खायी है |

DATE: 28|11|06
DISCLAIMER: ALL CHARACTERS, INCIDENTS AND PLACES IN THIS POEM ARE NON-FICTITIOUS. RESEMBLANCE TO ANY PERSON LIVING OR DEAD OR TO ANY INCIDENT OR PLACE IS PURELY INTENTIONAL. :)

Monday, January 3, 2011

विश्वास है तू आएगी !!!

साथ बिताए उन पलों को तू कैसे भुला पायेगी ?
विश्वास है तू एक दिन वापस आएगी |
सवेरा-श्याम हमारा एक हुआ करता थे  ,
बिना एक-दूजे पहर ना गुज़रते थे |
उन शरारती किस्सों को तू कैसे भुला पायेगी ?
दिल मेरा कहता है तू लौट कर आएगी |

हम झील किनारे बैठें ना, एैसी श्याम कहाँ होती थी ,
कोई रात अन-बन बिना खतम नहीं होती थी |
अगला दिन सुलह करते निकल जाता था ,
फिर श्याम को साथ खड़ा देख चाँद भी मुस्कुराता था |
इन यादों के कारवां को क्या तू रो़क पायेगी ?
विश्वास है मुझे तू लौट कर आएगी |

 

Friday, December 3, 2010

माना प्यार करता हूँ |


माना मैं प्यार करता नहीं ,
पर तू तो मुझे चाहती थी ना |
माना मैं कुछ समझता नहीं ,
पर तू तो सब समझती थी ना |
माना मैंने गलती की ,
पर भुला तू उसे चुकी थी ना |
माना मैं याद करता नहीं ,
पर तू तो खत लिखती थी ना |
माना मैं रूठा बहुत ,
पर तू माना लेती थी ना |
माना मैं गंभीर हूँ ,
पर हँसा तू देती थी ना |
माना मैंने देर की ,
पर इंतज़ार तू करती थी ना |

माना आज मैं भी तुझे याद करता हूँ ,
जितना तू किया करती थी ना |
माना आज उन लम्हों को तरसता हूँ ,
जिनमें तू साथ हुआ करती थी ना |
माना मैं आज तेरा होना चाहता हूँ ,
पर तू अब किसी और की है ना |
माना मैं भी प्यार करता हूँ ,
पर तेरा प्यार पाना अब मुश्किल है ना .......